परिचय:
29 दिसंबर 1917 को लाहौर में जन्मे चंद्रमौली चोपड़ा की ज़िंदगी संघर्ष से शुरू हुई, लेकिन वही संघर्ष आगे चलकर इतिहास बन गया। माँ को बचपन में खोने के बाद नानी ने उन्हें गोद लिया और उनका नाम रामानंद पड़ा। यही रामानंद आगे चलकर रामानंद सागर बने—ऐसे रचनाकार, जिन्होंने मनोरंजन को आस्था और संस्कृति से जोड़कर भारतीय टेलीविजन की दिशा ही बदल दी।
रामानंद सागर: संस्कृति का टीवी सफर
रामानंद सागर ने ‘रामायण’ को टीवी धारावाहिक का रूप देकर इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भगवान श्रीराम की मर्यादा, आदर्श और जीवन-मूल्यों को जन-जन तक पहुँचाया। धारावाहिक जगत में कदम रखने से पहले वे ‘चरस्’, ‘जलते बदन’ और ‘रोमांस’ जैसी सफल फ़िल्में भी बना चुके थे।
उनके प्रमुख और लोकप्रिय टीवी धारावाहिकों में ‘रामायण’, ‘कृष्णा’, ‘विक्रम और बेताल’, ‘दादा-दादी की कहानियाँ’, ‘अलिफ़ लैला’ और ‘जय गंगा मैया’ शामिल हैं।
रामायण: संकट में संस्कृति का सहारा
वर्ष 2020 में कोरोना महामारी और 21 दिन के लॉकडाउन के दौरान लोगों के हित को ध्यान में रखते हुए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और प्रसार भारती ने 28 मार्च 2020 से रामायण का दूरदर्शन पर पुनः प्रसारण शुरू किया। जनता की भारी मांग और रुचि के कारण लिया गया यह निर्णय पूरी तरह सफल रहा। प्रसारण शुरू होते ही रामायण ने एक बार फिर रिकॉर्ड टीआरपी हासिल कर अपनी लोकप्रियता सिद्ध कर दी।
रामानंद सागर: सम्मान और विरासत
कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2000 में रामानंद सागर को पद्मश्री सम्मान से अलंकृत किया। भारतीय संस्कृति और धार्मिक मूल्यों को जन-जन तक पहुँचाने वाले रामानंद सागर का 12 दिसंबर 2005 को निधन हो गया, लेकिन उनकी रचनाएँ आज भी सांस्कृतिक विरासत के रूप में जीवित हैं।
Author: NewsHint Editorial Team
(यह लेख उपलब्ध स्रोतों, अभिलेखों और सार्वजनिक जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है।)
